भाजपा सरकार का नया नारा:
“बहुत हुई बेरोज़गारी की मार, तलो पकौड़ा, लगाओ पान!”
बढ़ती बेरोज़गारी की मार झेलता आज का हिन्दुस्तान !

सिमरन

शिक्षा और रोज़गार किसी भी समाज में प्रगति की बुनियादी शर्ते होती हैं। और इन दोंनो ज़रूरतों को पूरा करने की ज़िम्मेदारी पूर्ण रूप से देश की सरकार की  बनती है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 16 में इसका उल्लेख करते हुए कहता है कि सबको काम के सामान अवसर उपलब्ध करवाए जाएँगे। लेकिन शब्दों की जादूगरी का फायदा उठाकर वर्तमान सरकार से लेकर पिछली तमाम सरकारों ने इस देश की जनता को हमेशा धोखा ही दिया है। आज के फासीवादी दौर में जहाँ पूँजीवाद अपने नाक तक संकट में है वहाँ इस संकट के दलदल से उसे निकालने के लिए फासीवाद आम जनता के बुनियादी मूलभूत अधिकारों का जिस प्रकार नंगा हनन कर रहा है उससे साफ़ हो जाता है कि यह सरकारें किस की चाकरी करती हैं। देश भर की बात करें तो आज किसी भी समय के मुकाबले बेरोज़गारी की दर अभूतपूर्व तरिके के बढ़ रही है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सी.एम.आई.ई.) के फरवरी 2018 के आँकड़ों पर नज़र डाले तो भारत में बेरोज़गारी की दर 6.1 प्रतिशत थी और बेरोज़गारों की संख्या 3.1 करोड़! वही अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर संघ (आई.एल.ओ.) के मुताबिक 2018 में भारत में बेरोज़गारी दर पिछले 2 सालों के 3.4 प्रतिशत के मुकाबले बढ़कर 3.5 प्रतिशत होने के आसार हैं। लेकिन इन आँकड़ों की सीमाएँ गाँव-देहात तक नहीं पहुँच पाती न ही शहर की फैक्टरियों में खट रहे असंगठित और कैजुअल सेक्टर के युवा मज़दूरों को इन आँकड़ों में शामिल किया जाता है। अगर ठेके पर खट रहे युवाओं से लेकर असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे युवाओं को इन आँकड़ों में शामिल किया जाए तो हमारे देश में लगभग 26 करोड़ युवा आज बेरोज़गार घूम रहे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि जिनके पास रोज़गार है उन्हें भी श्रम कानूनों का पालन करते हुए न्यूनतम वेतन दिया जाता हो। इस पर बात किसी और लेख में की जायेगी लेकिन फिलहाल इस देश की सत्ता के केन्द्र यानी राजधानी दिल्ली में बेरोज़गारी की हालत पर तफसील से बात की जायेगी। दिल्ली भारत की राजधानी है और देश में बेरोज़गारी की भीषणता का अन्दाज़ा दिल्ली जैसे महानगर में बेरोज़गारों की हालत को देख कर लगाया जा सकता है। दिल्ली में देश के अलग-अलग राज्यों से नौजवान-मज़दूर एक बेहतर ज़िन्दगी और रोज़गार की तलाश में आते हैं। लेकिन न तो उनका बेहतर ज़िन्दगी का ख़्वाब पूरा होता है और न ही उन्हें रोज़गार मिलता है। छोटा-मोटा काम करके या 14-14 घण्टे की शिफ्ट में फैक्टरियों में काम कर, रेड़ी-खोमचा लगा किसी तरह वो अपना जीवनयापन करते हैं। बेरोज़गारी कितनी बड़ी समस्या है इसका अंदाज़ा लगाने के लिए वैसे तो किसी आँकड़ें की ज़रूरत नहीं है, एक बार अपने आस-पास नज़र दौड़ाने से ही पता चल जाता है कि छोटे से छोटे काम या नौकरी के लिए लाखों लोग लाइनों में लगे हैं।

राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) 1972-73 से अखिल भारतीय आधार पर विभिन्न क्षेत्रों से रोज़गार और बेरोज़गारी के आँकड़े जमा कर रहा है। एनएसएसओ के ताज़ा सर्वेक्षण के मुताबिक जून 2012 में दिल्ली में बेरोज़गारों की संख्या करीब 2.66 लाख थी जो बढ़कर 2013 में 9.13 लाख तक पहुँची। 2014 में दिल्ली में 10.47 लाख व्यक्ति बेरोज़गार थे जो संख्या 2015 आते-आते 12.21 लाख का आँकड़ा पार कर गयी। और नए आँकड़ों का इंतज़ार करने का भी कोई फायदा नहीं है क्योंकि मोदी सरकार बेरोज़गारी तो दूर नहीं कर सकती इसीलिए इस साल  सरकार बेरोज़गारी के आँकड़ों को सार्वजानिक करने से इंकार कर रही है। आरएसएस द्वारा चलाई जा रही इस सरकार को लगता है कि यदि जनता को बेरोज़गारी के आँकड़े न बताये जाये तो उसे लगेगा की बेरोज़गारी ही नहीं है! दिल्ली सांख्यिकीय हैंडबुक 2016 में छपे आँकड़ों के मुताबिक 2015 में दिल्ली में रोज़गार कार्यालयों में 10.83 लाख से ज़्यादा बेरोज़गारों ने पंजीकरण करवाया। पंजीकृत बेरोज़गारों में से 26% से ज़्यादा स्नातक अथवा इससे भी ज़्यादा उच्च शिक्षा प्राप्त थे और करीब 74% मेट्रिक या हायर सेकण्डरी तक शिक्षित थे। 2005 में पंजीकृत बेरोज़गारों की संख्या 5.56 लाख थी यानी की 10 सालों के भीतर बेरोज़गारों की संख्या करीब-करीब दुगनी हो गयी है। 2015 में जहाँ 56,576 बेरोज़गार ऐसे थे जिनके पास डिप्लोमा थे जबकि 2013 में यह आँकड़ा 44,934 था। 2011 की जनगणना के हिसाब से 2011 की कुल आबादी के केवल 31.61 % के पास 183 दिन या उससे ज़्यादा का काम था। इस आँकड़े से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आरजी तौर पर अनियमित रूप से काम करने वाले लोगों की संख्या कितनी बड़ी है। जिनके पास पक्के रोज़गार का कोई ज़रिया नहीं है। और जो जैसे-तैसे कर अपना गुज़ारा चला रहे हैं। दिल्ली सरकार की आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 की रिपोर्ट के मुताबिक 2011 में कामकाज़ी आबादी का 3.25% हिस्सा घरेलू औद्योगिक श्रमिक थे। यानी की ऐसे लोग जो स्वरोज़गार के ज़रिये या पीस रेट पर अपने ही घर में कुछ न कुछ काम कर अपना गुज़ारा चलाते हैं। लेकिन सबसे बड़ा हिस्सा मज़दूरों का था जो कि औद्योगिक और तृतीय क्षेत्र की गतिविधियों में संलग्न थे।

जैसा कि लेख की शुरुआत में बताया गया था सीएमआईई और आईएलओ जैसी संस्थाए भी पूर्ण रूप से सर्वेक्षण कर बेरोज़गारों की संख्या पता लगाने में असमर्थ रहती हैं। उनके सैंपल सर्वे का साइज इतना छोटा होता है कि गणित की सांख्यकी के नियम वास्तविकता के घरातल में प्रवेश करने की जगह बस उसकी सतह को छू कर लौट आते हैं। उसी प्रकार ऊपर दिए गए सरकारी आँकड़ों से बेरोज़गारों का एक बहुत बड़ा हिस्सा गिनती से ही बाहर रहता है। दिल्ली के 29 औद्योगिक क्षेत्रों की फैक्टरियों, गरीब बस्तियों और सड़क पर अपनी ज़िन्दगी बिता रहे बेरोज़गारों और बेघरों की गिनती इन सर्वेक्षणों की पहुँच से बाहर है। वज़ीरपुर, बवाना, बादली, नरेला, ओखला, पटपड़गंज, गाँधी नगर आदि औद्योगिक क्षेत्रों में बहुतेरी फैक्टरियाँ ऐसी है जो फैक्ट्रीज एक्ट के अन्तर्गत पंजीकृत भी नहीं हैं। और पंजीकरण न होने के कारण ऐसे सरकारी सर्वेक्षण वहाँ के मज़दूरों और बेरोज़गारों तक पहुँच भी नहीं पाते। ठेके पर काम करने वाली बड़ी आबादी अर्ध-बेरोज़गारों की भी होती है, जिनके पास कुछ महीने काम होता है और कुछ महीने वो एक फैक्ट्री से दूसरी फैक्ट्री तक चप्पल फटकारते हुए घूमते हैं। अर्ध-बेरोजगारों के अलावा ठेका प्रथा का दंश झेल रहे ऐसे भी श्रमिक हैं जो सालों से एक ही फैक्ट्री में काम कर रहे हैं लेकिन उसके बावजूद उन्हें नियमित नहीं किया गया है। ऐसे में छटनी की तलवार हमेशा उनके सर लटकती रहती है। और बेरोजगारों की सड़कों पर घूमती फौज को मद्देनज़र रखते हुए फैक्ट्री मालिकों के लिए बेरोजगारों का शोषण करना और भी आसान हो जाता है। ऐसे में इन आँकड़ों से उभरी बेरोज़गारी की तस्वीर बहुत हद तक अधूरी ही रहती है।

मोदी सरकार ने 2014 के चुनाव से पहले यह वादा किया था कि वो हर साल 2 करोड़ रोज़गार पैदा करेगी। लेकिन सत्ता में आने के बाद वही मोदी आज देश की गरीब और बेरोज़गार आबादी से पकौड़े तलने को कह रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने भी चुनाव से पहले दिल्ली की जनता से 5 साल में 8 लाख नौकरियाँ पैदा करने और 55,000 रिक्त सरकारी पदों को भरने का चुनावी वादा किया था। लेकिन हक़ीक़त यह है कि 15-16 फरवरी 2018 को दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित रोज़गार मेले में बेरोजगारों के अनुपात में न के बराबर नौकरियों के अवसर पेश किए गए। प्राइवेट कम्पनियों को बुला कर बस अपनी छवि जनता के सामने चमकाने के लिए यह तमाशा किया गया था। वैसे इस तमाशे के बादशाह तो भाजपा सरकार के मुखिया हैं जिन्होंने ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’, ‘स्टार्ट उप इंडिया’ जैसे जुमलों का खूब बड़ा गुब्बारा फुलाया और उसकी हवा निकल जाने पर मेहनतकश अवाम को पकौड़े तलने और भीख माँगने की हिदायत दे रहें हैं। हाल ही में त्रिपुरा के चुनाव जीतने के बाद वहाँ के मुख्य मंत्री बिप्लब देव भी प्रधान सेवक के पदचिह्नों पर चलते हुए वहाँ के युवाओं को प्रवचन देते हुए कह रहे हैं कि सरकारी नौकरी के पीछे भागने की बजाये अगर युवा पान की दूकान लगाए तो 10 साल में उनके खाते में 5 लाख रुपये जमा हो जाएँगे। इस बयान पर गौर करने से दो बाते साफ़ हो जाती हैं पहली यह कि यह सरकार युवाओं को रोज़गार देने में पूरी तरह असमर्थ है और न ही रोज़गार पैदा करने में उसकी कोई रूचि भी है। दूसरा इस तरह की बयानबाज़ी से सरकार इस देश के युवाओं के प्रति अपनी जवाबदेही से हाथ धोना चाहती है। 2014 में ‘बहुत हुई बेरोज़गारी की मार, अब की बार मोदी सरकार’ का हवाई जुमला उछाला गया और जैसे ही सत्ता की कुर्सी पर विराजमान हुए वैसे ही इस देश की जनता को ठेंगा दिखा यह सरकार अदानी-अम्बानी की चाकरी में लीन हो गयी। बेरोज़गारी की समस्या पर संजीदा होकर विचार किया जाए तो आज यह हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या है। लेकिन सरकार में बैठे नेता-मंत्रियों के बयान से साफ़ झलकता है कि वे इस समस्या के प्रति बिलकुल भी गम्भीर नहीं हैं। पिछले 4 साल में मोदी सरकार ने जुमलों के अलावा इस देश की जनता को कुछ नहीं दिया और अब जब 2019 के चुनाव सर पर है तो हमारा ध्यान असली मुद्दों से भटकाने के लिए फिर से फ़िरकापरस्ती और हिन्दू-मुसलमान के झगड़ों को हवा देने की साज़िश रची जायेगी। व्हाट्सअप के ज़रिये लगातार इस देश की आम मेहनतकश आबादी के दिमाग में ज़हर घोला जा रहा है और उनसे देश की प्रगति के लिए कुर्बानी देने की माँग की जा रही है। नोटबन्दी के दौरान भी इसी तरह की भावनाओं को हवा दी गयी थी, कि देश की तरक्की के लिए आम जनता को यह बलिदान देना ही होगा। लेकिन अब हमारे सामने उसका सच भी ज़ाहिर हो चुका है। काले धन को वापिस लाने के नाम पर जो ताण्डव किया गया उसमे आम मेहनतकश आबादी को नुकसान के अलावा कुछ नहीं मिला और न ही देश की तरक्की हुई। आज देश में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना राजद्रोह नहीं बल्कि देशद्रोह है क्योंकि इस सरकार की देश की परिभाषा में इस देश में रहने वाले आम मेहनतकश लोग नहीं बल्कि चन्द मुट्ठीभर पूँजीपति आते हैं। इसीलिए अगली बार जब कोई आपके दिमाग में साम्प्रदायिकता का ज़हर घोलने की कोशिश करें तो आप ज़िन्दगी के असली मुद्दों पर सोचियेगा और इनकी दुरंगी चालों का मुँहतोड़ जवाब देने के लिए एक हो जाइये।

 

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,मई-जून 2018

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